गुर्जर प्रतिहार वंश

संस्थापक    – हरिशचन्द्र
वास्तविक    – नागभट्ट प्रथम (वत्सराज)
पाल            धर्मपाल
राष्ट्रकूट       ध्रव
प्रतिहार –    वत्सराज
गुर्जर प्रतिहार वंश
गुर्जर प्रतिहार वंश

राजस्थान के दक्षिण पश्चिम में गुर्जरात्रा प्रदेश में प्रतिहार वंश की स्थापना हुई। ये अपनी उत्पति लक्ष्मण से मानते है। लक्षमण राम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे। अतः यह वंश प्रतिहार वंश कहलाया। नगभट्ट प्रथम पश्चिम से होने वाले अरब आक्रमणों को विफल किया। नागभट्ट प्रथम के बाद वत्सराज शासक बना। वह प्रतिहार वंश का प्रथम शासक था जिसने त्रिपक्षीप संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष/त्रिराष्ट्रीय संघर्ष में भाग लिया।
त्रिपक्षीय संघर्ष – 
8 वीं से 10 वीं सदी के मध्य लगभग 200 वर्षो तक पश्चिम के प्रतिहार पूर्व के पाल और दक्षिणी भारत के राष्ट्रकूट वंश ने कन्नौज की प्राप्ति के लिए जो संघर्ष किया उसे ही त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है।

■ नागभट्ट द्वितीय

वत्सराज के पश्चात् शक्तिशाली शासक हुआ उसने भी अरबों को पराजित किया किन्तु कालान्तर में उसने गंगा में डूब आत्महत्या कर ली।

■ मिहिर भोज प्रथम

इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक इसने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर कन्नौज पर अपना अधिकार किया और प्रतिहार वंश की राजधानी बनाया। मिहिर भोज की उपब्धियों की जानकारी उसके ग्वालियर लेख से प्राप्त होती है।
  • आदिवराह व प्रीाास की उपाधी धारण की।
  • आदिवराह नामक सिक्के जारी किये।
  • मिहिर भोज के पश्चात् महेन्द्रपाल शासक बना।
  • इस वंश का अन्तिम शासक गुर्जर प्रतिहार वंश के पतन से निम्नलिखित राज्य उदित हुए।
★मारवाड़ का राठौड़ वंश
★मेवाड़ का सिसोदिया वंश
★जैजामुक्ति का चन्देश वंश
★ग्वालियर का कच्छपधात वंश

■ हुरड़ा सम्मेलन {हुरड़ा – भीलवाडा}

1707 ई. में औरंगजेब के निधन के पश्चात् मराठे अत्याधिक शक्तिशाली हो गए उन्होने उत्तर भारत पर आक्रमण कर चैथ व सरदेश मुखी नामक कर वसुले।
  • राजस्थान में मराठो ने सर्वप्रथम बुंदी में प्रवेश किया वे राजस्थान पर जब तब आक्रमण करते और चैथ व सरदेश मुखी कर वसुलते तब परेशान होकर जयपुर के सवाई जयसिंह ने राजस्थान के शासकों का आहान किया। सवाई जयसिंह ने हुरडा सम्मेलन 1734 ई में बुलाया। इस सम्मेलन में सभी रियासतों के शासक एकत्रित हुए। इसकी अघ्यक्षता मेवाड़ के शासक संग्राम सिंह द्वितीय द्वारा की जानी थी परन्तु सम्मेलन से पूर्व ही इनकी मृत्यु होने के कारण इस सम्मेलन की अध्यक्षता इनके पुत्र जगतसिंह द्वितीय ने की।
  • 16 व 17 जुलाई 1734 को सम्पन्न होने वाले इस सम्मेलन में मराठा आक्रमण के विरूद्ध संघ बनाकर उन्हें एकमुश्त (इकट्ठा) कर भुगतान करने का निश्चय किया। 17 जुलाई को सभी शासकों ने इस संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। किंतु सवाई जयसिंह ने मराठों से एक गुप्त संधि की परिणाम स्वरूप हुरडा सम्मेलन असफल सिद्ध हुआ।

■गुर्जर-प्रतिहार

8वीं से 10वीं शताब्दी में उत्तर भारत में प्रसिद्ध राजपुत वंश गुर्जर प्रतिहार था। राजस्थान में प्रतिहारों का मुख्य केन्द्र मारवाड़ था। पृथ्वीराज रासौ के अनुसार प्रतिहारों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई है।
  • प्रतिहार का अर्थ है द्वारपाल प्रतिहार स्वयं को लक्ष्मण वंशिय सूर्य वंशीय या रधुकुल वंशीय मानते है। प्रतिहारों की मंदिर व स्थापत्य कला निर्माण शैली गुर्जर प्रतिहार शैली या महामारू शैली कहलाती है। प्रतिहारों ने अरब आक्रमण कारीयों से भारत की रक्षा की अतः इन्हें “द्वारपाल”भी कहा जाता है। प्रतिहार गुर्जरात्रा प्रदेश (गुजरात) के पास निवास करते थे। अतः ये गुर्जर – प्रतिहार कहलाएं। गुर्जरात्रा प्रदेश की राजधानी भीनमाल (जालौर) थी।
  • मुहणौत नैणसी (राजपुताने का अबुल-फजल) के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की कुल 26 शाखाएं थी। जिमें से मण्डोर व भीनमाल शाखा सबसे प्राचीन थी।
  • मण्डौर श्शाखा का संस्थापक – हरिचंद्र था।
  • गुर्जर प्रतिहारों की प्रारम्भिक राजधानी -मण्डौर

■भीनमाल शाखा

1. नागभट्ट प्रथम

नागभट्ट प्रथम ने 730 ई. में भीनमाल में प्रतिहार वंश की स्थापना की तथा भीनमाल को प्रतिहारों की राजधानी बनाया।

2. वत्सराज द्वितीय

वत्सराज भीनमाल प्रतिहार वंश का वास्तिवक संस्थापक था। वत्सराज को रणहस्तिन की उपाधि प्राप्त थी। वत्सराज ने औसियां के मंदिरों का निर्माण करवाया। औसियां सूर्य व जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसके समय उद्योतन सूरी ने “कुवलयमाला” की रचना 778 में जालौर में की। औसियां के मंदिर महामारू शैली में बने है। लेकिन औसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन शैली में बना है।
  • औसियां राजस्थान में प्रतिहारों का प्रमुख केन्द्र था।
  • औसिंया (जोधपुर)के मंदिर प्रतिहार कालीन है।
  • औसियां को राजस्थान को भुवनेश्वर कहा जाता है।
  • औसियां में औसिया माता या सच्चिया माता (ओसवाल जैनों की देवी) का मंदिर है जिसमें महिसासुर मर्दनी की प्रतिमा है।
  • जिनसेन ने “हरिवंश पुराण ” की रचना की।
  • वत्सराज ने त्रिपक्षिय संर्घष की शुरूआत की तथा वत्सराज राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से पराजित हुआ।
  • त्रिपक्षिय/त्रिराष्ट्रीय संघर्ष  कन्नौज को लेकर उत्तर भारत की गुर्जर प्रतिहार पूर्व में बंगाल का पाल वंश तथा दक्षिणी भारत का राष्ट्रवंष के बीच 100 वर्षो तक के चले संघर्ष को त्रिपक्षिय संघर्ष कहा जाता है।

3. नागभट्ट द्वितीय

वत्सराज व सुन्दर देवी का पुत्र। नागभट्ट द्वितीय ने अरब आक्रमणकारियों पर पूर्णतयः रोक लगाई। नागभट्ट द्वितीय ने गंगा समाधि ली। नागभट्ट द्वितीय ने त्रिपक्षिय संघर्ष में कन्नौज को जीतकर सर्वप्रथम प्रतिहारों की राजधानी बनाया।

4. मिहिर भोज (835-885 ई.)

मिहिर भोज को आदिवराहप्रभास की उपाधि प्राप्त थी। मिहिर भोज वेष्णों धर्म का अनुयायी था। मिहिरभोज प्रतिहारों का सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था। इस काल चर्माेत्कर्ष का काल था। मिहिर भोज ने चांदी के द्रुम सिक्के चलवाये। मिहिर भोज को भोज प्रथम भी कहा जाता है। ग्वालियर प्रशक्ति मिहिर भोज के समय लिखी गई।
  • 851 ई. में अरब यात्री सुलेमान मिहिर भोज के समय भारत यात्रा की। अरबी यात्री सुलेमान कल्वण ने अपनी राजतरंगिणी (कश्मीर का इतिहास) में मिहिर भोज के प्रशासन की प्रसंशा की। सुलेमान ने भोज को इस्लाम का शत्रु बताया।

5. महिन्द्रपाल प्रथम

इसका गुरू व आश्रित कवि राजशेखर था। राजशेखर ने कर्पुर मंजरी, काव्य मिमांसा, प्रबंध कोश हरविलासबाल रामायण की रचना की। राजशेखर ने महेन्द्रपाल प्रथम को निर्भय नरेश कहा है।

6. महिपाल प्रथम

राजशेखर महिपाल प्रथम के दरबार में भी रहा। 915 ई. में अरब यात्री अली मसुदी ने गुर्जर व राजा को बोरा कहा है।

7. राज्यपाल

1018 ई. में मुहम्मद गजनवी ने प्रतिहार राजा राज्यपाल पर आक्रमण किया।

8. यशपाल

1036 ई. में प्रतिहारों का अन्तिम राजा यशपाल था।
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